पशुपालन 21 मिनट17 सितंबर 2026

दुधारू पशुओं के लिए चारा और साइलेज प्रबंधन: साल के हर महीने हरा चारा

दुधारू पशु को साल के तीन सौ पैंसठ दिन हरा चारा चाहिए, लेकिन भारत में हर चारा फसल मौसमी है। यह गाइड बताती है कि चारे की बुवाई आगे-पीछे करके, गड्ढे या बैग में साइलेज बनाकर गर्मी की कमी कैसे भरें — और चारा महँगे भाव पर खरीदने से कैसे बचें।

दुधारू पशुओं के लिए चारा और साइलेज प्रबंधन: साल के हर महीने हरा चारा

किसी भी डेयरी किसान से पूछिए कि पैसा कहाँ जाता है, जवाब मिलेगा — चारा-दाना। और मई में अचानक दूध घट जाने की वजह पूछिए, तो जवाब भी लगभग हमेशा एक ही होता है: हरा चारा खत्म हो गया। दूध देने वाली गाय-भैंस को साल के हर दिन हरा चारा चाहिए, पर भारत में चारे के लिए उगाई जाने वाली शायद कोई फसल साल के हर दिन नहीं मिलती। यही बेमेल — रोज़ की एक बराबर जरूरत, और मौसम के हिसाब से घटती-बढ़ती आपूर्ति — चारा प्रबंधन की पूरी समस्या है, और इसका हल दो चीजों से निकलता है: बुवाई आगे-पीछे करना ताकि कुछ न कुछ हमेशा कटने लायक खड़ा रहे, और अच्छे महीने का अतिरिक्त चारा संभालकर रखना ताकि तंगी के महीने में खिलाया जा सके। यह गाइड दोनों को समझाती है, साथ ही उन चारा फसलों को भी जो असल में भारतीय डेयरी को चलाती हैं — और उनमें से उन दो को भी जो लापरवाही से खिलाने पर पशु को नुकसान पहुँचा सकती हैं।

साल भर हरा चारा ही तय करता है कि दूध का पर्चा कितना बनेगा

हरा चारा दुधारू पशु के लिए वह काम करता है जो सूखा चारा कर ही नहीं सकता। इसमें नमी होती है, कैरोटीन होता है जिसे पशु विटामिन A में बदलता है, पचने वाला रेशा होता है जो रूमेन को एक रफ्तार से चलाए रखता है, और दलहनी चारों में वाकई काम का प्रोटीन होता है। भरपूर हरा चारा पाने वाला पशु अपना दूध बनाए रखता है, उसकी खाल और बाल चमकते रहते हैं, वह समय पर गर्मी में आता है, और उतने ही लीटर दूध के लिए बाहर से कम दाना लगता है। वही पशु अचानक सिर्फ भूसे पर आ जाए तो कुछ ही दिनों में दूध गिरा देता है, और डेयरी पर उसके फैट और SNF के आँकड़े भी डोलने लगते हैं।

असली नुकसान वहाँ होता है जहाँ हरा चारा खत्म होने पर किसान क्या करता है। कमी पूरी करने के लिए वह ज्यादा दाना खरीदता है, या किसी और से हरा चारा खरीदता है — और पोषण खरीदने के ये दोनों सबसे महँगे तरीके हैं, ठीक उसी मौसम में जब गाँव के बाकी सब लोग भी वही चीज ढूँढ रहे होते हैं। मानसून से पहले के हफ्तों में हरी मक्का की एक गाड़ी उससे कई गुना महँगी बैठती है जितने में वही चारा सीज़न में उगाने वाले को पड़ा था। चारा प्रबंधन असल में खेती का हिसाब नहीं, छोटी डेयरी के हाथ में खर्च घटाने का सबसे सस्ता हथियार है।

आगे बढ़ने से पहले एक बात साफ कर दें: यह गाइड चारा उगाने, संभालकर रखने और रोज़ पहुँचाने के बारे में है। किस पशु को रोज़ कितना खिलाना है, चारे और दाने तथा खनिज मिश्रण का संतुलन कैसे बैठाना है, और पानी की खपत दूध पर कैसे असर डालती है — ये आहार-संतुलन के सवाल हैं और उन पर अलग लेख है। यहाँ हम सिर्फ यह पक्का कर रहे हैं कि जब आहार में हरा चारा लिखा हो, तब आपके बाड़े में हरा चारा वाकई मौजूद हो।

बुवाई की तारीख नहीं, कटाई की खिड़कियों में सोचें

सोच में सबसे काम का बदलाव यही है कि चारे की योजना बुवाई की तारीख से बनाना छोड़ दें और कटाई की खिड़की से बनाना शुरू करें। एक कागज लें, एक तरफ बारह महीने लिखें, और ईमानदारी से निशान लगाएँ कि साल के किन हफ्तों में आपके पास हरा चारा कटने के लिए खड़ा रहता है। यह काम करने वाले लगभग हर डेयरी किसान को वही दो छेद मिलते हैं: मानसून टूटने से पहले की गर्म-सूखे हफ्ते, और रबी के दलहनी चारे की आखिरी कटाई से खरीफ फसल जमने तक का छोटा अंतराल। उपज इन्हीं छेदों में बहती है, और जो छेद आपने ढूँढा ही नहीं उसे भरा भी नहीं जा सकता।

कैलेंडर कागज पर आ जाए तो आगे-पीछे बुवाई की बात खुद-ब-खुद समझ आ जाती है। चारे वाली मक्का का पूरा खेत एक साथ बोने के बजाय, उसे दो-तीन हिस्सों में दो-तीन हफ्ते के अंतर से बोएँ। एक साथ बोई गई बड़ी बुवाई एक साथ ही तैयार होती है: एक हफ्ते तक पशु खा ही नहीं पाते उतना हरा चारा हो जाता है, और उसके बाद फसल खड़ी-खड़ी लंबी, कड़ी और कम पचने वाली होती जाती है, फिर भी आप उसे खिलाते रहते हैं। दो-तीन हिस्सों में बोने से उतनी ही जमीन सही अवस्था के चारे की चलती-रहती आपूर्ति बन जाती है।

इसके बाद दोनों तरह के चारे को जानबूझकर एक-दूसरे के ऊपर बिठाएँ। मक्का, ज्वार और नेपियर जैसे अनाजी चारे मात्रा, ऊर्जा और शुष्क पदार्थ देते हैं; बरसीम, रिजका और लोबिया जैसे दलहनी चारे प्रोटीन देते हैं और चारे का स्वाद बढ़ाते हैं। एक ही हफ्ते में दोनों में से एक-एक उपलब्ध हो तो आप उन्हें मिलाकर खिला सकते हैं, जो अकेले किसी एक से रूमेन के लिए कहीं बेहतर है और दाने का खर्च तथा शुद्ध दलहनी चारे का जोखिम दोनों घटाता है। जहाँ जमीन कम है, वहाँ मक्का की कतारों के बीच दलहनी फसल लगाकर एक ही खेत से दोनों लिए जा सकते हैं।

तो चारे के नीचे कितनी जमीन रखनी चाहिए? यह गाइड जानबूझकर प्रति क्षेत्र कोई आँकड़ा नहीं देती, क्योंकि सच्चा जवाब यह है कि यह आपके खेत पर निर्भर है, किसी फॉर्मूले पर नहीं। आपकी जोत का कितना हिस्सा हमेशा हरे चारे के नीचे रहना चाहिए, यह इस पर टिका है कि असल में कितने पशु दूध दे रहे हैं (सूखे पशु और बछड़ा-बछड़ी को बहुत कम चाहिए), बाकी जमीन को घर के लिए क्या कमाकर देना है, सूखे हिस्से के लिए अपना गेहूँ या धान का भूसा है या नहीं, गर्मियों में सिंचाई भरोसे की है या नहीं, और आस-पास हरा चारा वाजिब भाव पर मिल जाता है या नहीं। इसके बजाय अपने कैलेंडर से उल्टा हिसाब लगाएँ: अगर कैलेंडर में दो महीने बिना हरे चारे के दिख रहे हैं, तो वे दो महीने या तो बहुवर्षीय चारे का ब्लॉक भरेगा या साइलेज का गड्ढा — और उसका आकार आप उतने पशुओं के हिसाब से तय करेंगे जिन्हें आप असल में खिला रहे हैं।

वे चारा फसलें जो भारतीय डेयरी को चलाती हैं

  • चारे वाली मक्का सबसे भरोसेमंद फसल है और साइलेज की मानक फसल भी: यह जल्दी जमती है, छोटे मौसम में बड़ी मात्रा में नरम, मीठा और पशुओं को बहुत भाने वाला हरा चारा देती है, और एक ही कटाई की फसल है, इसलिए पूरा खेत एक साथ कटता है — साइलेज का गड्ढा एक ही बार में भरने के लिए यही सबसे सही बात है। इसमें शर्करा ज्यादा होने से किण्वन भी भरोसे के साथ होता है। बुवाई, दूरी और पोषण की पूरी जानकारी के लिए हमारी गाइड 'मक्का की खेती गाइड: खरीफ और रबी, अनाज और चारा' इसकी खेती को ठीक से समझाती है।
  • ज्वार उन जमीनों और मौसमों की फसल है जहाँ मक्का मुश्किल में पड़ जाती। यह सूखा और कमजोर मिट्टी दोनों बहुत बेहतर सह लेती है, और बहु-कटाई वाली चारा किस्में कटाई के बाद दोबारा फूटती हैं, इसलिए एक बुवाई से कई कटाई मिलती हैं। किसान इसे इसी मजबूती के लिए पसंद करते हैं — लेकिन छोटी, बौनी या दबाव में आई ज्वार में हाइड्रोसायनिक अम्ल का असली खतरा रहता है, जिस पर अगला हिस्सा है, और उसे टालना ठीक नहीं।
  • बरसीम उत्तर और मध्य भारत की रबी दलहनी चारा फसल है: सर्दियों में बोई जाती है, ठंडे महीनों भर बार-बार कटाई देती है, पशुओं को खूब भाती है, और प्रोटीन से भरपूर है — भूसे-प्रधान आहार का कुछ हिस्सा जब यह लेती है तो दूध साफ बढ़ता दिखता है। इसकी एक सावधानी है भूखे पशुओं को हरी-भरी शुद्ध बरसीम पर छोड़ देने से होने वाला अफारा, जिस पर नीचे बात है।
  • रिजका, जिसे लूसर्न या अल्फाल्फा भी कहते हैं, वहाँ की बहुवर्षीय दलहनी फसल है जहाँ अच्छे निकास वाली जमीन का एक टुकड़ा कुछ सालों के लिए दिया जा सके। एक बार जम जाए तो यह दोबारा बोए बिना कई सालों तक साल में कई कटाई देती है, और इसका प्रोटीन बहुत अच्छा होता है। इसे पानी भरना पसंद नहीं और कटाई के समय जड़ का मुकुट सँभालकर काटना पड़ता है, पर ठीक से रखा गया रिजके का खेत डेयरी की सबसे अच्छी प्रोटीन पूँजी में से एक है।
  • संकर नेपियर — बाजरा-नेपियर संकर और भारत में खूब फैली CO सीरीज़ की किस्में — बहुवर्षीय भारी चारा है। यह बीज से नहीं, तने के टुकड़ों या जड़ वाली कलमों से लगाया जाता है, एक स्थायी ब्लॉक बन जाता है, और फिर कई सालों तक बार-बार कटता रहता है। हरे चारे की मात्रा बहुत ज्यादा मिलती है, पर इसे जवान रहते ही काटना पड़ता है: लंबा हो जाने दिया तो यह कड़ा, रेशेदार और बेस्वाद हो जाता है, और बहुत मुलायम, कोमल बढ़वार में ऑक्सलेट ज्यादा तथा शुष्क पदार्थ कम रह सकता है — इसलिए इसे बीच की अवस्था में काटना और सूखे चारे के साथ खिलाना सबसे अच्छा चलता है, पूरे आहार के रूप में नहीं।
  • लोबिया, ग्वार और ऐसी ही जल्दी तैयार होने वाली दलहनी फसलें छेद भरने के काम आती हैं: कम अवधि की, बीच में कैच क्रॉप के तौर पर या मक्का की कतारों में मिलाकर बोई जाती हैं, और काम की इसलिए हैं कि वे कैलेंडर के दो-तीन हफ्ते के खाली हिस्से में बैठ जाने भर जल्दी तैयार हो जाती हैं, पूरा सीज़न खेत बाँधे बिना।

दो सावधानियाँ जो टाली नहीं जा सकतीं: ज्वार में हाइड्रोसायनिक अम्ल और बरसीम पर अफारा

छोटी ज्वार, और सूखे की मार से रुकी हुई ज्वार की दोबारा फूटी बढ़वार में हाइड्रोसायनिक अम्ल होता है — जिसे प्रूसिक एसिड या HCN भी कहते हैं — और यह वाकई ऐसा जहर है जो पशु को जल्दी मार सकता है। इसकी मात्रा छोटे कोंपलों में और बौनी, दबाव में आई दोबारा फूटी बढ़वार में सबसे ज्यादा होती है, और जैसे-जैसे पौधा बढ़कर पकता है यह घटती जाती है। इसलिए व्यावहारिक नियम ये हैं: ज्वार बहुत छोटी और नीची हो तब न चराएँ न काटें, पहले उसे ठीक से बढ़ने दें; सूखे या ठंड की मार से रुकी हुई दोबारा फूटी बढ़वार पर तब तक न चराएँ जब तक वह उबरकर बढ़ न जाए; और भूखे पशु को छोटी ज्वार के खेत में कभी न छोड़ें, क्योंकि भूखा पशु तेजी से खाता है और मुलायम कोंपलें ही खाता है — यह सबसे खराब जोड़ है। फसल काटकर खिलाने से पहले कुछ घंटे मुरझाने देने से खतरा काफी घटता है, और साइलेज बनाने से भी, क्योंकि किण्वन खुद यह अम्ल घटा देता है। अगर आपकी ज्वार सूखे की मार में है और दूसरा चारा नहीं है, तो खिलाने के बाद नहीं, खिलाने से पहले अपने पशु चिकित्सक या नजदीकी KVK से पूछ लें।

बरसीम, रिजका और ऐसे ही रसीले दलहनी चारों में दूसरा खतरा है — अफारा। जब पशु गीली, मुलायम, शुद्ध दलहनी बढ़वार से जल्दी-जल्दी पेट भर लेता है, तो रूमेन में गैस ऐसे टिकाऊ झाग के रूप में जमा हो जाती है जिसे पशु डकार कर निकाल नहीं पाता; बायाँ पेट साफ दिखने लायक फूल जाता है, साँस लेने में तकलीफ होने लगती है, और बुरी तरह अफरा हुआ पशु थोड़े ही समय में मर सकता है। बचाव सीधा अनुशासन है। रसीले दलहनी चारे पर छोड़ने से पहले कुछ सूखा चारा या भूसा खिला दें ताकि पशु भूखा न हो, दलहनी चारे को शुद्ध खिलाने के बजाय अनाजी चारे या कटे भूसे में मिलाकर दें, ओस या बारिश से भीगा हुआ न खिलाएँ, और आहार में पहली बार शामिल करते समय रातों-रात बदलने के बजाय कई दिनों में धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाएँ।

इन दोनों में पशु के बिगड़ने और हाथ से निकल जाने के बीच का समय बहुत कम होता है। इन्हें पहचानना सीखें — ज्वार खाया पशु जो अचानक लड़खड़ाए, तेज साँस ले और मसूड़े चटक लाल दिखें, या दलहनी चारा खाया पशु जिसका बायाँ पेट फूलता जाए — और खुद घरेलू इलाज करने के बजाय तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएँ। पशुओं के आम रोगों पर हमारी अलग गाइड में अफारे की पहचान और विस्तार से दी गई है।

साइलेज असल में क्या है, और यह काम कैसे करता है

साइलेज वह हरा चारा है जिसे काटकर, कतरकर और हवा-बंद करके इस तरह दबाया गया हो कि वह सड़ने के बजाय अचार की तरह बन जाए। चारे में पहले से मौजूद लैक्टिक अम्ल बैक्टीरिया हरी सामग्री की शर्करा पर पलते हैं, लैक्टिक अम्ल बनाते हैं, और खटास इतनी बढ़ा देते हैं कि सड़ाने वाले जीव काम ही नहीं कर पाते। इसके बाद चारा टिक जाता है और महीनों तक अपनी हरे चारे वाली खासियत — नमी, स्वाद, पोषण का बड़ा हिस्सा — बनाए रखता है। यह समझना जरूरी है कि यह सुखाकर संभालना नहीं, किण्वित होकर संभलना है: आप सूखा चारा नहीं बना रहे, अचार जैसी चीज बना रहे हैं।

इसका मतलब है कि हवा ही दुश्मन है, और तरीके की हर बात उसे निकालने के लिए ही है। जहाँ भी ढेर के अंदर हवा फँसी रह जाती है, वहाँ लैक्टिक बैक्टीरिया की जगह फफूंद और यीस्ट पनपते हैं, ढेर गरम हो जाता है, शुष्क पदार्थ जलकर बर्बाद होता है, और गड्ढा खोलने पर ऊपर वह सड़ी, बदबूदार तह मिलती है जिसे कोई पशु मुँह नहीं लगाता। बारीक कतरना, जोर से दबाना और हवा-बंद सील करना तीन अलग-अलग सलाहें नहीं हैं — ये एक ही काम करने के तीन तरीके हैं, और वह काम है हवा बाहर निकालना और बाहर ही रखना।

साइलेज भारतीय हालात में दो वजहों से खासतौर पर फिट बैठता है। पहली, सूखा चारा बनाने के लिए लगातार कई साफ धूप वाले दिन चाहिए, जो मानसून भरोसे के साथ देता ही नहीं; साइलेज एक बार सील हो जाए तो मौसम की परवाह नहीं करता। दूसरी, यह भारतीय चारे की समस्या पर ठीक बैठता है — खरीफ में पशु खा ही नहीं पाते उतना हरा चारा होता है, और मानसून से पहले के महीनों में लगभग कुछ नहीं होता। साइलेज पहले दौर का चारा दूसरे दौर में पहुँचा देता है, और इतना सस्ता यह काम कोई दूसरा तरीका नहीं करता।

साइलेज बनाना: गड्ढा या बैग, और वे कदम जो नतीजा तय करते हैं

शुरुआत फसल और उसकी अवस्था से करें। आम चुनाव चारे वाली मक्का है, और काटने की अवस्था वह है जब दाना दूधिया अवस्था पार कर आटे जैसी गूँथने लायक अवस्था में आ जाए — भुट्टा भर चुका हो, पर पौधा अभी हरा, मीठा और नम हो। इस खास खिड़की की वजह है: किण्वन को शर्करा भी चाहिए और नमी भी। बहुत जल्दी काटी फसल पनीली और कम शर्करा वाली होती है, जिससे साइलेज खट्टा हो जाता है और रस रिसता है; और सूखने-पकने तक छोड़ी फसल नमी खो देती है, दबती नहीं, इसलिए आप जितना भी पैर से दबाएँ, ढेर के अंदर हवा फँसी रह जाती है।

नमी किसी आँकड़े से नहीं, हाथ से जाँचें। कटे चारे की एक मुट्ठी लेकर जोर से दबाएँ। अगर उँगलियों के बीच से पानी टपके तो चारा बहुत गीला है — भरने से पहले कुछ घंटे खेत में मुरझाने दें। अगर मुट्ठी खोलते ही गोला बिखर जाए और हथेली सूखी रहे तो बहुत सूखा है — या तो देर से काटा गया या ज्यादा देर मुरझाया। चाहिए वह गोला जो ढीला-ढाला अपना आकार बनाए रखे और हथेली को बस नम छोड़ जाए।

चारे को बारीक कतरें, करीब दो से तीन सेंटीमीटर के टुकड़ों में। यही वह कदम है जिसमें किसान सबसे ज्यादा कोताही करते हैं, और आगे का सब कुछ यही तय करता है। बारीक कतरा चारा घना दब जाता है और लंबे तनों के बीच हवा की जगह नहीं छूटती, अपनी शर्करा बैक्टीरिया के काम के लिए छोड़ देता है, और बाद में नाँद पर पशु मोटे टुकड़े छाँटकर फेंकते नहीं, पूरा खाते हैं। लंबा, बिना कतरा चारा आप कितना ही वजन रख दें, हवा-बंद नहीं दबता।

गड्ढा या बैग, यह अपने पशुओं की संख्या देखकर चुनें। गड्ढा या जमीन के ऊपर बना बंकर बड़ी, स्थायी डेयरी के लिए ठीक है: उसे ऊँची जगह पर बनाएँ ताकि बारिश का पानी उसमें कभी न घुसे, दीवारें चिकनी और प्लास्टर या अस्तर की रखें ताकि हवा के रास्ते न बनें, और सबसे जरूरी — उसे हफ्ते भर में नहीं, एक ही लगातार काम में भरकर सील करने की योजना बनाएँ। बैग, ड्रम और छोटी गाँठें कुछ पशुओं वाले घर के लिए ठीक हैं: खर्च कम, जगह बदलकर शेड के नीचे रखे जा सकते हैं, और सबसे बड़ी बात यह कि एक बार में एक ही इकाई खुलती है, इसलिए दो पशुओं को खिलाने के लिए छोटी डेयरी को पूरा गड्ढा हवा में खोलना नहीं पड़ता।

तह-दर-तह भरें और हर तह को जोर से दबाएँ — छोटे गड्ढे में पैरों से, बड़े में ट्रैक्टर से — क्योंकि हवा दबाव से ही बाहर निकलती है। गड्ढे को जमीन की सतह से ऊपर गुंबद जैसा भरें, ताकि ढेर बैठने के बाद भी ऊपरी सतह बारिश का पानी बहा दे, इकट्ठा न करे। फिर पूरी तरह सील करें: बिना फटी प्लास्टिक की चादर, किनारों से अच्छी तरह दबाई हुई, ऊपर मिट्टी, पुराने टायर या गोबर-मिट्टी के लेप से भारी की हुई, और बारिश के बाद देख लें कि पानी कहीं जमा या घुस नहीं रहा। जिस दिन चारा कतरा उसी दिन सील किया गड्ढा साफ किण्वित होता है; कई दिन आधा खुला छोड़ा गड्ढा बंद होने से पहले ही बिगड़ना शुरू कर देता है।

गुड़-सिरा, नमक या बाजार का बैक्टीरिया कल्चर जैसी चीजें साइलेज की हर बातचीत में आती हैं। इनकी जगह साफ समझ लें: ये वैकल्पिक हैं। जिन फसलों में शर्करा कुदरती तौर पर कम है या जब नमी ठीक नहीं बैठ रही, वहाँ ये मदद कर सकती हैं, पर मोटे कतरन या ढीली सील को ये कभी नहीं बचा सकतीं — और सही समय पर काटी मक्का पर बारीक कतरन और हवा-बंद दबाई गई भराई कुछ भी मिलाए बिना अक्सर बढ़िया साइलेज देती है। अगर इन्हें डालना ही हो तो मात्रा दुकानदार के अंदाज़े से नहीं, अपने KVK, पशु चिकित्सालय या जिला दूध संघ से पूछकर तय करें। सील करने के बाद गड्ढे को खोलने से पहले करीब छह से आठ हफ्ते बिना छेड़े पड़ा रहने दें; किण्वन को पूरा होकर टिकने के लिए इतना समय चाहिए।

गड्ढा खोलने पर: अच्छा साइलेज और बिगड़ा साइलेज पहचानना

साइलेज पशु के मुँह तक पहुँचने से पहले ही आप नाक, आँख और हाथ से परख सकते हैं। अच्छे साइलेज से अचार या ताजा दही जैसी सुहानी मीठी-खट्टी महक आती है, और वह महक हाथ पर बुरी नहीं, अच्छी लगती है। रंग हरापन लिए पीला, जैतूनी या हल्का सुनहरा भूरा होता है। छूने में वह कसा और लचीला लगता है, कतरे टुकड़े अलग-अलग पहचान में आते हैं, और वह लसलसे ढेर की तरह चिपकता नहीं। जिन पशुओं को इसकी आदत पड़ चुकी है, वे इसे मन से खाते हैं।

बिगड़ा साइलेज भी खुद ही बता देता है। तीखी बासी बदबू, गोबर या सड़े मक्खन जैसी गंध, या नाक में लगने वाली अमोनिया की चुभन — तीनों का मतलब है कि गलत किण्वन हावी हो गया। तंबाकू जैसा भूरा या काला पड़ा माल बताता है कि हवा फँसी रहने से ढेर ज्यादा गरम हो गया था। उँगलियों के बीच लिस-लिसाता, नरम, लोंदे जैसा माल, या साफ दिखती सफेद, नीली या हरी फफूंद — यानी सड़ाने वाले जीव पनप चुके हैं। बर्बादी बचाने के लिए फफूंद लगे और सड़े हिस्से बाकी में मिलाने के बजाय फेंक दें — फफूंद वाला चारा दुधारू पशु को वाकई बीमार कर सकता है, और उसका साइलेज से मन भी उठा देगा।

साइलेज कैसे निकाला जाता है, यह उतना ही मायने रखता है जितना कैसे भरा गया था। सिर्फ एक सिरा या एक सतह खोलें, उसी सतह से ऊपर से नीचे तक सीधी परत काटकर दिन भर की जरूरत निकालें, और खुली सतह फिर तुरंत ढक दें। गड्ढे के ऊपर से पूरी चादर न हटाएँ: जितना हिस्सा हवा में खुलेगा वह दोबारा बिगड़ना शुरू कर देगा, और चारों तरफ से खुला गड्ढा पशुओं के खाने से ज्यादा बाद के बिगाड़ में गँवा देगा। बाड़े में जमा करने के बजाय उतना ही निकालें जितना उसी दिन खा लिया जाए। और पहली बार साइलेज देते समय थोड़ी मात्रा रोज़ के हरे चारे में मिलाकर दें और करीब एक हफ्ते में बढ़ाएँ — महक पशुओं के लिए नई होती है और कुछ को अपनाने में कुछ दिन लगते हैं।

तंगी के मौसम की कमी, चारा महँगे भाव पर खरीदे बिना भरना

गर्मी और मानसून-पूर्व की कमी का मुख्य जवाब साइलेज है, पर अकेला जवाब नहीं — और जो डेयरी तीन-चार स्रोतों पर टिकी होती है वह खराब साल एक ही गड्ढे पर टिकी डेयरी से बेहतर काट लेती है।

फसल अवशेष आपकी अपनी सबसे सस्ती भराई है। गेहूँ और धान का भूसा प्रोटीन में कमजोर और मुश्किल से पचने वाला है, पर दो सीधी बातें उसे कहीं ज्यादा काम का बना देती हैं। खिलाने से पहले भूसा कतरने से पशु असल में ज्यादा खाता है और नाँद पर पैरों तले जो बर्बाद होता था वह तेजी से घटता है। और भूसे पर यूरिया-गुड़ के घोल का उपचार — तह-दर-तह ढेर लगाते समय घोल छिड़ककर, फिर कुछ हफ्तों के लिए हवा-बंद ढककर रखना, जिससे यूरिया भूसे के कड़े बंधन तोड़ता है और उसमें नाइट्रोजन बढ़ाता है — पाचनशीलता और पोषण दोनों वाकई सुधारता है। सिद्धांत समझें, पर घोल का अनुपात अंदाज़े से न बनाएँ, अपने पशु चिकित्सालय, KVK या जिला दूध संघ से पूछकर तय करें, क्योंकि यूरिया ज्यादा हो जाना पशु के लिए खतरनाक है — और यूरिया से उपचारित भूसा छोटे बछड़ा-बछड़ी को कभी न खिलाएँ।

पेड़ों का चारा वह स्रोत है जो ज्यादातर किसानों के पास पहले से है और सबसे कम इस्तेमाल होता है। मेड़ों और खेत की सीमा पर लगे चारा-पेड़ ठीक उन महीनों में हरे रहते हैं जब खेत का चारा खत्म हो चुका होता है, उन्हें हर मौसम बोना नहीं पड़ता, और उनके पत्तों में खनिज अक्सर खेत के चारे से खासे ज्यादा होते हैं। हमारी गाइड 'पशुओं के लिए पेड़ों का चारा: आपके खेत में उगने वाला मुफ्त खनिज-युक्त आहार' बताती है कि कौन-सी प्रजातियाँ लगाने लायक हैं, उन्हें मारे बिना कैसे छाँटें, और किन्हें सीमित मात्रा में ही खिलाना चाहिए। जिनके पास तालाब या हौज है उनके लिए एक और रास्ता हमारी गाइड 'पशु-पक्षी चारे के लिए स्वांगहर (डकवीड): आपके तालाब पर उगता मुफ्त प्रोटीन' में है, जो गर्मी के उन महीनों में खड़े पानी पर उगता है जब जमीन पर कुछ नहीं उग रहा होता।

आखिर में, पैसे का हिसाब ईमानदारी से देखें। तंगी के मौसम में खरीदा चारा बेचने वाले के बाजार में खरीदा जाता है: प्रति गाड़ी भाव ठीक उन हफ्तों में सबसे ऊँचा होता है जब इलाके की हर डेयरी के पास कमी है, और वह नकद खर्च तब बैठता है जब दूध पहले से ही घटा हुआ है। जो एक-एक किलो हरा चारा आपने भरपूर और लगभग मुफ्त वाले मौसम में संभालकर रखा, वह एक किलो आप उस ऊँचे भाव पर नहीं खरीदते। यही अदला-बदली — तंगी के मौसम में नकद के बजाय अतिरिक्त वाले मौसम में मेहनत — साइलेज के गड्ढे का असली मुनाफा है, और इसीलिए चारे का कैलेंडर आपकी मुख्य नकदी फसल जितनी ही योजना का हक रखता है।

चारे का पूरा साल जोड़कर देखें

सब जोड़ें तो अच्छी तरह चलाया गया चारा-वर्ष ऐसा दिखता है। अपने बारह महीने कागज पर उतारें और वे हफ्ते निशान लगाएँ जहाँ हरा चारा वाकई नहीं है। एक बहुवर्षीय ब्लॉक रखें — संकर नेपियर, या जहाँ जमीन इजाजत दे वहाँ रिजका — जो दोबारा बोए बिना उत्पादन देता रहे, यही आपकी रीढ़ है। मौसमी बुवाई दो-तीन हफ्ते के अंतर से हिस्सों में करें ताकि कटाई चलती रहे, ढेर न बने, और एक अनाजी तथा एक दलहनी चारा एक-दूसरे पर बिठाकर रखें ताकि मिलाकर खिला सकें। छोटी या दबाव में आई ज्वार को इज्जत से बरतें, और भूखे पशु को हरी-भरी बरसीम पर कभी न छोड़ें। खरीफ के अतिरिक्त चारे में, आटे जैसी अवस्था वाली मक्का को बारीक कतरें, गड्ढे या बैगों में हवा-बंद दबाएँ, उसी दिन सील करें, और छह से आठ हफ्ते छेड़े नहीं। तंगी के महीनों में उसी गड्ढे की एक सतह से खिलाएँ, साथ में कतरा और उपचारित भूसा तथा पेड़ों का चारा रखें, और चारे के बाजार से दूर रहें।

कुछ बातें स्थानीय स्तर पर पक्की कर लेने लायक हैं: आपके जिले में कौन-सी चारा किस्में और नेपियर या CO सीरीज़ का कौन-सा क्लोन असल में चलता है, आपका राज्य पशुपालन या डेयरी विभाग साइलेज के प्रदर्शन करा रहा है या चारा कटाई मशीन और साइलेज बैग उपलब्ध करा रहा है, और आपके खास पशुओं के लिए जिला दूध संघ क्या सलाह देता है। ये सिफारिशें राज्य-राज्य में अलग होती हैं और समय-समय पर बदलती रहती हैं, इसलिए आँकड़ों के लिए अपने KVK, स्थानीय पशु चिकित्सालय, जिला पशुपालन कार्यालय और अपनी सहकारी डेयरी समिति को अधिकारी मानें, और इस गाइड को इस बात की समझ मानें कि वे आँकड़े क्यों मायने रखते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

साइलेज क्या है, और डेयरी के लिए यह क्यों मायने रखता है?+

साइलेज वह हरा चारा है जिसे बारीक कतरकर हवा-बंद दबाया जाता है, ताकि लैक्टिक अम्ल बैक्टीरिया उसकी शर्करा को किण्वित करके उसे अचार की तरह टिका दें और वह महीनों काम का रहे। यह इसलिए मायने रखता है कि यह चारे को खरीफ की भरमार से — जब पशु खा ही नहीं पाते उतना हरा चारा होता है — मानसून से पहले के उन गर्म महीनों में पहुँचा देता है जब लगभग कुछ नहीं होता, और ठीक तभी दूध घटता है और खरीदा चारा सबसे महँगा पड़ता है।

साइलेज के लिए मक्का कब काटनी चाहिए, और उसमें नमी कितनी होनी चाहिए?+

तब काटें जब दाना दूधिया अवस्था पार कर आटे जैसी अवस्था में आ जाए और पौधा अभी हरा तथा मीठा हो — किण्वन को शर्करा और नमी दोनों चाहिए। नमी किसी आँकड़े से नहीं, हाथ से जाँचें: कटे चारे की मुट्ठी जोर से दबाएँ, अगर पानी टपके तो बहुत गीला है और कुछ घंटे मुरझाना चाहिए, और अगर गोला सूखा बिखर जाए तो वह हवा-बंद दबने लायक नहीं। सही अहसास वह गोला है जो ढीला-ढाला अपना आकार बनाए रखे और हथेली को बस नम छोड़ जाए।

क्या छोटी या सूखे की मार खाई ज्वार पशुओं को खिलाना सुरक्षित है?+

नहीं। ज्वार के छोटे कोंपल और सूखे की मार से रुकी दोबारा फूटी बढ़वार में हाइड्रोसायनिक अम्ल होता है, जिसे प्रूसिक एसिड भी कहते हैं, और यह पशु को जल्दी मार सकता है। काटने या चराने से पहले फसल को बढ़कर पकने दें, दबाव में आई दोबारा फूटी बढ़वार पर उबरने तक न चराएँ, और भूखे पशु को छोटी ज्वार के खेत में कभी न छोड़ें। खिलाने से पहले काटकर मुरझाने देने से खतरा घटता है, और साइलेज बनाने से भी। अगर दूसरा चारा ही नहीं है तो खिलाने से पहले अपने पशु चिकित्सक या KVK से पूछ लें।

बरसीम से अफारा होने से कैसे रोकें?+

हरी-भरी बरसीम देने से पहले कुछ सूखा चारा या भूसा खिला दें ताकि पशु भूखा न रहे, दलहनी चारे को शुद्ध देने के बजाय अनाजी चारे या कटे भूसे में मिलाकर दें, ओस या बारिश से भीगा हुआ न खिलाएँ, और रातों-रात बदलने के बजाय कई दिनों में धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाएँ। अगर पशु का बायाँ पेट फूल जाए और साँस लेने में तकलीफ दिखे तो तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएँ — अफारा जल्दी जान ले सकता है।

कैसे पता चले कि मेरा साइलेज अच्छा बना है या बिगड़ गया है?+

अच्छे साइलेज से अचार या ताजा दही जैसी सुहानी मीठी-खट्टी महक आती है, रंग हरापन लिए पीला से हल्का सुनहरा भूरा होता है, और वह कसा-लचीला लगता है जिसमें कतरे टुकड़े पहचान में आते हैं। बिगड़े साइलेज से तीखी बासी, गोबर जैसी या अमोनिया जैसी बदबू आती है, रंग तंबाकू जैसा भूरा या काला दिखता है, और छूने में लिस-लिसाता या लोंदे जैसा लगता है, अक्सर सफेद, नीली या हरी फफूंद के साथ। बिगड़े और फफूंद लगे हिस्से खिलाने के बजाय फेंक दें, और साइलेज हमेशा एक ही खुली सतह से निकालकर उसे तुरंत ढक दें।

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